एक रात थी बडी हसीन सी,
आसमन था पूरा जिसमे तारे थे अनगिनत,
एक चाँद था और शहर पे सोई हुई उसकी चाँदनी थी,
कुत्ते थे चौराहे पे कभी कभी भौंकते हुए,
रास्ते थे जो सन्नाटे से भरे थे,
एक गरीब था जो फूटपाथ पे सोया था
जेसे पूरा शहर उसका हो,
कुछ आँखो में नींद नहीँ थी
कुछ में सूखे हुए आँसु थे,
एक आवाज़ थी कही बच्चे के रोने की,
शहर के तालाब के उपर जिलमिलाति चाँद की रोशनी थी,
पटरी पे सरकती हुए ट्रेन थी जो रात के सन्नाटे को चीर के निकल रही थी,
सन्नाटा था,सिसक थी,शांति थी,चेन था,शुकून था,आँसू थे,
सूरज दुनिया के दूसरे छोर पे था
पर वेश्यालय में जेसे अभी दिन था,
और एक रात थी जो बड़ी हसीन थी,...
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