ज़िंदगी बस यूही गुजरती चली
कुछ लोग बस मिलते रहे बार बार
कुछ बस मिलके बिछड़ते रहे
राहों मे कोई अजनबी मिला कभी
तो कभी कोई अपना अजनबी हो चला
रास्ते के पत्थर बस वही दास्तान सुनाते रहे
और फूल मूरजाते चले वही रास्ते पर
पेड़ो की छाव वही लेट गई रास्ते पर
जिसे कुचलकर हम चल दिए
मंज़िल तो पता था एक ही हैं
मिलना तो मौत से ही हैं
पर फिर भी हम रास्ते बदलते रहे
कुछ मुसाफिर बस दिल मे बस गये
कुछ यूही दिल चीर के निकल गये
रास्ते मे बहोत कुछ मिलता गया
जो पता था मौत लेने वाली हैं हमसे
वो तो ज़िंदगी को भी नही छोड़ती
जिंदगी बस यूही गुजरती चली!!!!!!!